Kohraam

आज हिंदु मुस्लिम के बीच की दरारे उन लोगो के हाथ में हैं जिन्हे सिर्फ अपने स्वार्थ की पड़ी हैं। भारत जैसे देश की पहचान उसके अनेक रंगो में हैं। इस देश की पहचान उसके सौहार्द में हैं। भारत में अनेक धाराओ के संगम का देश कहा जाता है। यह कोई मामुली खिताब नहीं है। अनेक संस्कृतियों को समाहित करने का गुण स्वार्थियो में नहीं पनप पाता। दुसरो को बराबरी का हक देने के लिए बहुत बड़ा जिगर चाहिए होता है। भारत में सभी लोग बराबर है। ऐसे में किन्हीं भी दो समुदायों के बीच आपसी रंजिश हमारे सामाजिक शांति में दखल दे सकती है। हिन्दू मुस्लिम के बीच चल रहे इस नंगे नाच को बंद होना होगा इसी वक़्त।जिन लोगो को दंगों की हकीकत नहीं पता हैं वो यह सुन ले कि दंगो में आग लगाने वाले कभी नहीं मरते। मरते हैं तो मासूम और निर्दोष लोग। किसी का पोता स्कूल से वापस आ रहा है, किसी की बेटी कॉलेज गयी हुई हैं,किसी की बहू बाजार से सामान खरीद रही हैं, किसी का भाई हॉस्पिटल में भर्ती हैं, ये लोग दंगों की चपेट में आते हैं, और अगर हमारे परिवार में किसी को भी बेवजह ऐसे हालात का सामना करना पड़े तो किसे दोष देंगे हम?
भीड़ पर केस नहीं होता है। दंगाइयो को न तो कोई धर्म होता हैं और ना कोई वजूद। मेरी लोगो से दरख्वास्त हैं कि जितना जल्दी हो सके वो इस ज़हर को फैलने से रोके। किसी अपने को खोने के बाद उनके पास दो ही रास्ते बचते हैँ। या तो वो उस दर्द को चुप चाप सहन करे या फिर दंगाइयों की भीड़ का हिस्सा बन जाये । यही दंगाई भी चाहते हैं की हम उनकी भीड़ में शामिल हो जाये और ये कत्लेआम चलता रहे। अभी उनको रोकने के लिए हम दबाव डाल सकते हैं लेकिन उनकी भीड़ में शामिल होने के बाद हमारे पास ये अवसर नहीं रहेगा। देश को प्रगति और तरक्‍की की जरूरत है। देश हज़ारों साल उस अंधेरी काल कोठरी में कैद रहा हैँ। धर्म और कर्म कांडो ने पहले भी देश को हज़ारों साल अँधेरे में रखा हैं, वही मंज़र दुबारा नहीं चहिये। धर्म के नाम पर देश को जलाना मूर्खता की निशानी हैं। पता नहीं लोगो को राजनैतिक शक्ति से ऐसा ज़हरीला लगाव क्यों हैँ। उस शक्ति के मद और चाहत में उन्हें ये भी नहीं दिखाई दे रहा हैं की उनके हाथ निर्दोष लोगो के खून से रंगने वाले हैं। मुझे उन मुर्खो से उम्मीद नहीं हैं। मुझे उम्मीद हैं अपने देश के उन आम लोगो से जो शान्ति से जीना चाहते हैं, उन लोगो से हैं जिनके छोटे छोटे सपने हैं और अपना जीवन उन सपनो में बिता देना वो अपना फ़र्ज़ मानते हैं।
जनता से बड़ा कोई नही। संविधान हैं क्यूंकि जनता ने चाहा । राजनीती हैं क्यूंकी जनता हैँ। देश हैं क्यूंकी जनता हैँ। सिर्फ जनता ही इस कोहराम को रोक सकती हैँ। भले ही COVID के बाद हमारी ज़िन्दगी मुश्किल हो गयी हैं, भले ही ज़िन्दगी का सबसे ख़राब समय चल रहा हैं, लेकिन ये समय बदलेग। बदलाव कुदरत का नियम हैं और आज का बुरा समय भी बदलेग। इस अँधेरी रात का सवेरा जरुर होगा, सब्र रखिये। यदि आज इन दंगाइयों के हाथ अपनी किस्मत की नाल पकड़ा दी तो हम उन हत्याओं के लिए कभी सर उठा कर नहीं जी पाएंगे। इन दंगो से जनता को कुछ हासिल नहीं होगा। जिन्हे हासिल होगा वो आने वाले समय में इन खून खराबे का सहारा ही लेंगे। जर्मनी में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। हिटलर ने देश की जनता को हिंसा में धकेल कर देश पर कब्जा कर लिया। और तो और, जर्मनी की सेना खुद अपने देशवाशियों की हत्या करने लगी थी। अब समय आ गया है कि हम तय करें कि क्या हम रोजाना ऐसी हिंसा चाहते हैं।सांप्रदायिक हिंसा एक आग है जो हमारे सपनों, हमारे जीवन, हमारी शांति और हमारे राष्ट्र को जला देगी। संवाद के माध्यम से एक रास्ता खोजें। यह हमारे लिए शांति का एकमात्र मौका है क्योंकि मृत लोग बात नहीं करते हैं।

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